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चोला माटी के हे राम

‘मां’ तो आख़िर ‘मां’ होती है। इस संसार में मां को भगवान का दर्ज़ा दिया गया है। मां ही वो शख्स है जो दु:ख को छिपाकर अपने बच्चे को संसार की सारी खुशियां देती है। मां के लिए बच्चों की खुशी ही संसार की सबसे बड़ी खुशी होती है, जब मां का यही सुख उससे दूर चला जाता है तो उस दु:ख की कल्पना करना अत्यंत ही कठीन हो जाता है।

छत्तीसगढ़ का एक ऐसा दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। जिसे जानकर आपकी आंखे नम हो जाएंगी। ऐसा सिर्फ आपने कहानियों और फिल्मों में ही देखा होगा। यह मामला राजनांदगांव के ममता नगर में रहने वाली एक मां का है।

एक लोक कलाकार पूनम तिवारी ने अपने बेटे की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए अपनी तकलीफ़ों को दरकिनार कर दिया। पूनम तिवारी ‘दाउ मंदराजी अलंकरण’ नाम के सम्मान से सम्मानित लोक गायिका हैं।

पूनम तिवारी के बेटे सूरज तिवारी जो 30 वर्ष के थे। सूरज तिवारी रंग-छत्तीसा नामक लोकमंच के संचालक और संगीतकार थे।

सूरज तिवारी बचपन में पिता के साथ नाटक ‘चरणदास चोर’ को देखने जाते थे। हबीब तनवीर के साथ काम किये थे, नाटक ‘आगरा बाज़ार’ का सैकड़ों शो किये और चंदैनी गोंदा व अन्य लोककला मंचों पर प्रस्तुती देते थे। सूरज तिवारी हृदय रोग से पीड़ित थे। बीते 26 अक्टूबर को उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था फिर 2 नवंबर की सुबह उनकी मृत्यु हो गई।

सूरज तिवारी की अंतिम इच्छा यही थी कि उनकी अंतिम यात्रा में मां पूनम तिवारी ‘चोला माटी के हे राम’ का गीत गा कर विदाई करे। लेकिन सूरज तिवारी की एक और अंतिम इच्छा थी कि वे छत्तीसगढ़ी में शहीद वीर नारायण सिंह पर फिल्म तैयार करें। इसके लिए वे कुछ दिनों से संघर्षरत थे।

सूरज तिवारी की लोकगीत वाली इच्छा को पूरी करने के लिए मां ने दिल पर पत्थर रखकर जब बेटे के अर्थी के सामने जीवन की सच्चाई पर आधारित लोकगीत ‘चोला माटी के हे राम, एखर का भरोसा’ गाकर उन्हें विदाई की, तब वहां मौज़ूद लोग अपनी भावनाओं को नहीं रोक पाए, सभी की आंखें नम हो गई। कला जगत से जुड़े सूरज के दोस्तों ने तबला, हारमोनियम बजा कर इस लोकगीत में मां का साथ दिया।

पूनम तिवारी अपने बेटे की शव यात्रा में यह लोकगीत गाकर अपने बेटे सूरज की अंतिम इच्छा पूरी की और सभी की आंखें नम कर दी।

मानसून

 

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इस साल भी बरसात का खुशनुमा मौसम आ गया है। जिससे अब सभी को भीषण गर्मी से राहत मिलने लगी है। खासकर ये मौसम किसानों के लिए काफी आनंदित है। लेकिन किसानों को इस आनंदमय मौसम में अपने उपजे हुए खेतों और उगाए गए धानों के संरक्षण के लिए उपाय ढूंढ लेना होगा। ताकि इस बार भी उनकी मेहनत में पानी न फिर जाए। टमाटर को 2रू किलो बेचने या फांसी लगानें का विकल्प न लेना पड़े। हर साल उपजे हुए खेतों और कई क्विंटल एकत्रित किए गए धान के भींगने से किसानों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसलिए आप सभी से निवेदन है कि एकत्रित किए गए उत्पाद के संरक्षण के लिए गरीब किसानों की मदद करें।आज बच्चा-बच्चा मोबाइल का आदि हो गया है। इस संदेश को गांव के  हर एक किसान के पास पहुंचाया जाए जिससे वे अपने खेतों में रखे हुए धानों को पानी से बचाए और उसके संरक्षण के लिए सरकार से मदद ले या स्वयं कोई तरकीब निकाल कर उत्पाद का संरक्षण करें।

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एहसास दिल तक छू जाए

मोहब्बत में देखा है ,


लेकिन बोल न सका ।


अश्कों को अक्सर 

पानी में मिलते देखा है ,


लेकिन छिपा न सका ।


गुमनाम होकर खुद को 

ढूंढते देखा है,


लेकिन खोज न सका।


लोगों को यूं ही 

परेशान होते देखा है 


लेकिन समझ न सका। 

अश्क़िया

मोहब्बत भी थी, ख्वाहिशें भी थीं
बस इज्ह़ार न हुआ।

अब्सार अश्क में थी, आशुफ़्ता भी थी

बस ज़ाहिर न हुआ।

ज़मीर में आग जलती भी थी, बुझती भी थी

बस तड़प न हुई।

दीवारें भी गिरी, ज़ख्म भी लगे

बस एहसास ना हुआ।

अश्क मोहब्बत में थी, ज़मीर पत्थर सा था

बस पहचान न हुई।

वैश्या बनती औरतों का दर्द

क्यों औरतों को उनका हक नही दिया जाता ?
क्यों उनको शादी के बाद पत्नी होने का दर्जा नही दिया जाता ?

क्यों मासूम बच्चियों को शिकार बनाया जाता है????
ऐसे में ही औरतें खुद से टूट जाती हैं ,

जब उनका एक छोटा मासूम सा बच्चा भूखा रहता है,

और माँ को कई दिनों तक खाना नसीब नही होता,

ऐसे में ही औरतों को  नरक के गड्ढ़े में खुद को जबरन ढकेलना पड़ जाता है।
जहां उसे अपने जिस्म को तोड़कर, अपने उम्मीदों को छोड़कर,

अपने और अपने बच्चों के लिए खुद को बेचना पड़ जाता है,

और उस नरक को ही अपना घर बनाना पड़ जाता है,
एक साधारण औरत से एक वैश्या की ज़िंदगी जीनी पड़ती है ।
क्यों औरतों को उनका हक नहीं दिया जाता है?????

😃

बहुत बुरा लगता है खुद को,

जब कोई अपना अजनबी लगने लगता है।

अजीब लगता है उसके साथ रहना,

अजीब लगने लगता है उससे बाते करना,

बहुत बुरा लगता है अब .. खुद को उसके साथ देखकर😑

ऐसा लगता है मानो.. कि मैं किसी पराये के साथ हूं।

अब पहले जैसा अपनापन नहीं रहा…..

जिंदगी में किसी के साथ हद से ज्यादा लगाव नहीं रखना चाहिए।

सभी चीजें जिंदगी में एक सीमित दायरे तक अच्छी लगती है।